सोच से Text तक: Conduit की AI, Human Brain और Neural Signals से Thoughts पढ़ने की दिशा में बड़ा कदम

सैन फ्रांसिस्को के एक शांत, बिना खिड़की वाले बेसमेंट में एक छोटा सा AI स्टार्टअप ऐसा काम कर रहा है, जो भविष्य में इंसान और मशीन के रिश्ते को बदल सकता है। इस कंपनी का नाम Conduit है। पिछले छह महीनों में कंपनी ने दावा किया है कि उसने करीब 10,000 घंटे का मानव मस्तिष्क-भाषा डेटा रिकॉर्ड किया है। यह रिकॉर्डिंग बिना किसी सर्जरी के की गई है और इसका उद्देश्य है—इंसानी सोच को सीधे शब्दों और टेक्स्ट में बदलना।

इस प्रोजेक्ट में हजारों लोग शामिल हुए। हर प्रतिभागी दो घंटे के सत्र के लिए एक छोटे रिकॉर्डिंग बूथ में बैठता था। वे खुलकर बोलते या टाइप करते थे, जबकि उनके सिर पर खास तरह के हेडसेट लगाए जाते थे। ये हेडसेट उस पल के दिमागी संकेत पकड़ते थे, जब कोई शब्द बोलने या लिखने से ठीक पहले बनता है। Conduit का मानना है कि इतना बड़ा neuro-language dataset पहले कभी तैयार नहीं हुआ।

शुरुआत में यह प्रक्रिया एक पारंपरिक प्रयोग की तरह थी, जहां प्रतिभागियों को तय निर्देश दिए जाते थे। लेकिन जल्द ही टीम को समझ आया कि यह तरीका स्वाभाविक भाषा को दबा रहा है। इसके बाद रणनीति बदली गई। प्रतिभागियों को एक large language model से खुली बातचीत करने दी गई। इससे बातचीत ज्यादा प्राकृतिक हुई और मस्तिष्क की गतिविधि, आवाज और टेक्स्ट के बीच बेहतर तालमेल दिखने लगा।

इतना बड़ा और सटीक डेटा जुटाने के लिए बाजार में मिलने वाले सामान्य उपकरण काफी नहीं थे। इसलिए Conduit ने अपना हार्डवेयर खुद बनाया। इन हेडसेट्स में EEG, functional near-infrared spectroscopy और दूसरे सेंसर जोड़े गए। ये भारी, 3D-printed हेडसेट करीब चार पाउंड वजनी थे। इन्हें आराम के लिए नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा संकेत पकड़ने के लिए डिजाइन किया गया था। कंपनी का कहना है कि आगे चलकर इन्हीं अनुभवों के आधार पर हल्के और उपयोगी हेडसेट बनाए जाएंगे।

सभी सेंसर से आने वाला डेटा एक ही सिस्टम में बिल्कुल सटीक समय के साथ सुरक्षित किया जाता था। यह इसलिए जरूरी था क्योंकि AI मॉडल उस दिमागी गतिविधि को समझने की कोशिश करता है, जो शब्द बनने से कुछ सेकंड पहले होती है। यहीं से “सोच” और “भाषा” के बीच का पुल बनता है।

सबसे बड़ी चुनौती थी electrical noise। बिजली के हस्तक्षेप से सिग्नल खराब हो जाते थे। टीम ने केबल्स को ढका, फिल्टर बदले और एक समय पर पूरी बिल्डिंग की बिजली बंद कर दी। लैब को बैटरी से चलाया गया। इससे सिग्नल बेहतर हुए, लेकिन नई परेशानियां भी आईं, जैसे भारी बैटरियों को बार-बार बदलना और डेटा का टूटना। बाद में जब रिकॉर्डिंग हजारों घंटों तक पहुंच गई, तो AI मॉडल अलग-अलग परिस्थितियों में भी पैटर्न पहचानने लगे और noise की समस्या काफी हद तक कम हो गई।

प्रोजेक्ट के बढ़ने के साथ काम करने का तरीका भी स्मार्ट होता गया। खराब डेटा को तुरंत पहचानने के लिए backend सिस्टम बदला गया। कुछ सुपरवाइज़र एक साथ कई बूथ्स पर नजर रखने लगे। एक खास scheduling सिस्टम बनाया गया, जिससे हेडसेट लगभग पूरे दिन इस्तेमाल में रहें। कंपनी के अनुसार, इन सुधारों से प्रति घंटे उपयोगी डेटा की लागत करीब 40 प्रतिशत तक घट गई।

अब डेटा संग्रह का काम लगभग पूरा हो चुका है। Conduit की टीम फिलहाल अपने AI models को ट्रेन और बेहतर बनाने में जुटी है। हालांकि, यह तकनीक इंसानी सोच को कितनी सटीकता से शब्दों में बदल पाएगी, इस पर कंपनी ने अभी पर्दा डाले रखा है।फिर भी इतना साफ है कि यह प्रयास केवल तकनीक का प्रयोग नहीं है, बल्कि उस दिन की झलक है जब बोलना जरूरी नहीं होगा—सोचना ही काफी होगा।

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